
बिना सप्लाई हजारों का जल बिल देखकर उपभोक्ताओं का ‘पारा हाई’, जांच में शिकायतें सही मिलीं तो 7-8 मामलों में बिल माफी का फैसला; पुरानी पानी टंकी बनेगी जोनल कार्यालय
अंबिकापुर। अंबिकापुर में नगर निगम की जल व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां कुछ उपभोक्ताओं के घर पानी की सप्लाई तो नहीं पहुंची, लेकिन जल कर का बिल नियमित रूप से जरूर पहुंचता रहा। यानी नल सूखा रहा और बिल की रफ्तार जारी रही। देखते ही देखते कुछ उपभोक्ताओं पर जल बिल का बकाया 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंच गया।
अब मामला नगर निगम की बैठक तक पहुंचा तो जांच कराई गई और शुरुआती जांच में करीब 7 से 8 उपभोक्ताओं की शिकायत सही पाई गई। इसके बाद नगर निगम ने ऐसे पात्र उपभोक्ताओं के जल बिल माफ करने का निर्णय लिया है। यानी फिलहाल जिन घरों में पानी नहीं पहुंचा, वहां बिल का बोझ भी नहीं रहेगा।
पानी नहीं आया, लेकिन बिल समय पर आता रहा!
नगर निगम की सामान्य सभा की बैठक सोमवार को महापौर मंजूषा भगत की अध्यक्षता में हुई। बैठक में शहर से जुड़े कुल 17 मुद्दों पर चर्चा की गई।
इसी दौरान जल बिल से जुड़ी शिकायतों का मुद्दा भी सामने आया। शिकायत थी कि कुछ इलाकों में घरों तक पानी की नियमित सप्लाई नहीं पहुंच रही थी, लेकिन उपभोक्ताओं के नाम पर जल कर लगातार जुड़ता रहा।
हालात कुछ ऐसे बन गए कि नल में पानी आने का इंतजार खत्म नहीं हुआ, लेकिन बिल आने का सिलसिला जरूर नहीं रुका।
जब बकाया राशि हजारों में पहुंची तो उपभोक्ताओं ने निगम का दरवाजा खटखटाया।
जांच हुई तो खुली ‘बिल वाली पाइपलाइन’
शिकायतों की वास्तविकता जानने के लिए कमेटी के माध्यम से जांच कराई गई। जांच में शुरुआती तौर पर 7 से 8 ऐसे उपभोक्ताओं के मामले सामने आए, जिनके घरों में पानी की सप्लाई नहीं पहुंची थी, लेकिन जल बिल जारी होता रहा।
शिकायत सही पाए जाने के बाद बैठक में ऐसे मामलों में उपभोक्ताओं को राहत देने पर सहमति बनी।
यानी अब कम से कम इन मामलों में ‘बिना पानी का बिल’ उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ नहीं बनेगा।
हालांकि, यह राहत केवल उन्हीं उपभोक्ताओं को मिलेगी जिनके मामले जांच में सही पाए जाएंगे।
पुरानी पानी टंकी अब बनेगी निगम का नया ठिकाना
बैठक में सिर्फ पानी के बिल ही नहीं, बल्कि निगम की व्यवस्थाओं को विकेंद्रीकृत करने का भी फैसला लिया गया।
केदारपुर की पुरानी पानी टंकी के भवन को जोनल कार्यालय के रूप में उपयोग करने का निर्णय लिया गया है। इसके शुरू होने के बाद आसपास के लोगों को संपत्ति कर, समेकित कर, जल कर सहित निगम से जुड़े कई छोटे-बड़े कामों के लिए मुख्य कार्यालय की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी।
मतलब अब हर काम के लिए शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने की कवायद कुछ कम हो सकती है।
दो सामुदायिक भवनों से निगम की कमाई बढ़ेगी
नगर निगम ने अपनी आय बढ़ाने के लिए भी कदम उठाया है। बैठक में बाबूपारा स्थित सामुदायिक भवन विश्वविद्यालय को किराए पर देने का निर्णय लिया गया है।
वहीं चांदमारी स्थित सामुदायिक भवन समाज कल्याण विभाग को किराए पर देने का प्रस्ताव है।
दोनों भवनों से निगम को एक-एक लाख रुपये प्रतिमाह किराया मिलने की उम्मीद है।
यानी जो भवन अभी तक निगम की संपत्ति थे, उनसे अब नियमित आमदनी जुटाने की तैयारी है।
शहर की सफाई का जिम्मा अब ‘ब्रांड एंबेसडरों’ के कंधों पर

स्वच्छता को लेकर निगम ने कुछ अलग करने की तैयारी की है। शहर के समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय लोगों को स्वच्छता अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया जाएगा।
इनके जरिए लोगों को साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन के प्रति जागरूक किया जाएगा।
अब देखना यह होगा कि शहर में कूड़ा कम होता है या फिर पहले ब्रांड एंबेसडरों की संख्या बढ़ती है।
नुक्कड़ नाटक से बताया जाएगा—कचरा डस्टबिन में डालिए
स्वच्छता अभियान को लोगों तक पहुंचाने के लिए नुक्कड़ नाटक और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
इन कार्यक्रमों के जरिए सार्वजनिक स्थानों पर कचरा नहीं फेंकने, कचरा प्रबंधन और शहर को साफ रखने का संदेश दिया जाएगा।
क्योंकि सफाई कर्मचारी अकेले कितना भी झाड़ू लगा लें, अगर नागरिकों की आदत नहीं बदली तो कचरा भी रोज अपनी ‘ड्यूटी’ पर वापस लौट आता है।
सेप्टिक टैंक सफाई अब 500 रुपये और महंगी
बैठक में सेप्टिक टैंक सफाई शुल्क में 500 रुपये की बढ़ोतरी करने का निर्णय भी लिया गया। निगम का तर्क है कि लंबे समय से शुल्क में संशोधन नहीं हुआ था और मौजूदा खर्च को देखते हुए इसमें बढ़ोतरी जरूरी है।
यानी शहरवासियों के लिए एक तरफ बिना पानी वाले गलत बिल में राहत की खबर है, तो दूसरी तरफ कुछ सेवाओं के लिए जेब थोड़ी और ढीली करनी होगी।
मल्टीपरपज हॉल का शुल्क भी बढ़ेगा
गांधी स्टेडियम परिसर स्थित मल्टीपरपज हॉल के विद्युत और सफाई शुल्क में भी बदलाव किया जाएगा। लंबे समय से शुल्क में संशोधन नहीं होने और बढ़ते खर्च को देखते हुए निगम ने इसमें वृद्धि का फैसला लिया है।
कुल मिलाकर MIC बैठक में राहत, राजस्व और व्यवस्था सुधार—तीनों पर फोकस दिखाई दिया। बिना पानी के बिल से परेशान उपभोक्ताओं को राहत देने का फैसला जहां सीधे जनता से जुड़ा है, वहीं जोनल कार्यालय और सामुदायिक भवनों को किराए पर देने जैसे फैसलों से निगम की व्यवस्थाओं और आय को मजबूत करने की कोशिश की गई है।
व्यंग्य में बात इतनी सी है—
नल में पानी आए या न आए, बिल समय पर आना चाहिए—यह व्यवस्था अब शायद बदलने जा रही है।
और अगर जांच में यह साबित हो जाए कि पानी पहुंचा ही नहीं, तो कम से कम ‘हवा में आया पानी’ का बिल तो जनता को नहीं भरना पड़ेगा!
