अंबिकापुर। पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले डॉ. एस.आर. रंगनाथन की जयंती के अवसर पर 27 सितंबर को अंबिकापुर स्थित सूर्यप्रकाश पुस्तकालय संघ एवं सूचना केंद्र में संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि एवं सामाजिक कार्यकर्ता अंकुर सिन्हा ने डॉ. रंगनाथन के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर की। इस दौरान उपस्थित लोगों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

कार्यक्रम में अजीज टोप्पो, रामधन प्रजापति, मार्शल लकड़ा और मनीष सिन्हा समेत अन्य लोग मौजूद रहे। सूर्यप्रकाश पुस्तकालय संघ के सचिव कमला प्रसाद पैंकरा, कोषाध्यक्ष प्रदीप सिंह नेताम, कार्यकारिणी सदस्य दयाराम, के.के. भारती और सुखलाल रौतिया सहित ग्राम सिधमा के मील साय, साधू राम और राजेश ने भी डॉ. रंगनाथन को श्रद्धांजलि अर्पित की।

प्राचीन काल से विकसित हुई पुस्तकालयों की परंपरा

संगोष्ठी के दौरान ग्रंथपाल जे.आर. ठाकुर ने पुस्तकालयों के इतिहास और उनके विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पुस्तकें केवल पढ़ने की सामग्री नहीं हैं, बल्कि इनमें विभिन्न कालखंडों के विचार, अनुभव और ज्ञान सुरक्षित रहते हैं। पुस्तकालय इन ज्ञान-स्रोतों को समाज तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

उन्होंने बताया कि पुस्तकालयों की परंपरा का इतिहास प्राचीन सभ्यताओं तक जाता है। असीरिया के शासक अशुरबनिपाल के पुस्तक संग्रह का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उस दौर में मिट्टी की पट्टिकाओं पर लेख दर्ज किए जाते थे। इसके बाद मिस्र के अलेक्जेंड्रिया स्थित प्रसिद्ध पुस्तकालय ने भी विश्व की ज्ञान परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

भारत में भी रही ज्ञान संरक्षण की समृद्ध परंपरा

जे.आर. ठाकुर ने भारतीय संदर्भ में बताया कि देश में ज्ञान और साहित्य के संरक्षण की परंपरा काफी पुरानी है। वैदिक काल में ज्ञान का प्रसार मुख्य रूप से श्रुति परंपरा के जरिए हुआ। बाद के समय में ताड़पत्र, भोजपत्र और पेड़ों की छाल जैसी प्राकृतिक सामग्री पर विभिन्न ग्रंथ लिखे गए।

उन्होंने कहा कि समय के साथ वेद, उपनिषद, आरण्यक, व्याकरण, दर्शन, धर्म और राजनीति सहित विभिन्न विषयों से संबंधित ग्रंथों की संख्या बढ़ती गई। नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्र भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि को दर्शाते हैं।

बदलते समय में भी पुस्तकालयों की उपयोगिता बरकरार

संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक डिजिटल दौर में भी पुस्तकालयों का महत्व कम नहीं हुआ है। पुस्तकालय पुस्तकों के संग्रह तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और विभिन्न संदर्भ सामग्री के माध्यम से लोगों को लगातार नई जानकारी प्राप्त होती है। इसे ज्ञान, विज्ञान और सूचना के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

वक्ताओं ने डॉ. एस.आर. रंगनाथन के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकालय की व्यवस्था में पुस्तक, पाठक और कर्मचारी तीनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन तीनों के समन्वय से ही पुस्तकालय समाज के लिए प्रभावी ज्ञान केंद्र बन सकता है।

युवाओं को किताबों से जुड़ने का संदेश

कार्यकारिणी सदस्य एवं सेवानिवृत्त प्रधान पाठक श्रीकृष्ण कुमार भारती ने युवाओं के बीच पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मोबाइल और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते उपयोग के बीच पुस्तकों के अध्ययन की आदत को बनाए रखना जरूरी है। उनका कहना था कि पुस्तकों में संचित ज्ञान का लाभ तभी मिलेगा, जब युवा नियमित रूप से उनका अध्ययन करेंगे।

कार्यक्रम के अंत में पुस्तकालय संघ के कोषाध्यक्ष प्रदीप सिंह नेताम ने अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी के माध्यम से पुस्तकालयों की ऐतिहासिक भूमिका के साथ-साथ वर्तमान समय में उनकी उपयोगिता को लेकर भी विचार साझा किए गए।

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