
अंबिकापुर। अंबिकापुर की सड़कें इन दिनों विकास की ऐसी कहानी लिख रही हैं, जिसे पढ़ने के लिए अखबार नहीं, बल्कि मास्क की जरूरत पड़ रही है। बरसात में सड़क के गड्ढों ने जनता का स्वागत किया था और अब मौसम बदला तो उन्हीं रास्तों ने धूल का ‘शुभारंभ’ कर दिया है।
कभी लोग कहते थे कि सड़क पर पानी डालो, अब हालत ऐसी है कि लोग कह रहे हैं—“भाई, सड़क पर पानी नहीं तो कम से कम हमारे ऊपर ही डाल दो, धूल से नहाना बंद हो!”
जनता की शिकायत है कि बरसात के दिनों में गड्ढों में पानी था और अब उन्हीं गड्ढों के सूखने के बाद धूल का साम्राज्य कायम हो गया है। सड़क से वाहन गुजरते ही ऐसा धूल का गुबार उठता है मानो सड़क नहीं, फ्री में स्मोक इफेक्ट वाला कोई फिल्मी सेट हो।
जनप्रतिनिधि गाड़ी में, जनता धूल में!
अंकुर सिंह ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधि लग्जरी फोर-व्हीलर में घूम रहे हैं, जबकि आम जनता सड़क पर धूल फांक रही है। जनता का सवाल भी बड़ा मासूम है—“साहब, आपकी गाड़ी के शीशे बंद हैं, हमारा तो पूरा शहर खुला है!”
हालात यह हैं कि दोपहिया वाहन चालक हेलमेट पहनकर निकलते हैं, लेकिन सड़क की धूल ऐसी है कि हेलमेट के ऊपर भी एक और हेलमेट यानी मास्क लगाना पड़ रहा है। आंखों में धूल, कपड़ों पर धूल और घर पहुंचते-पहुंचते चेहरे पर ऐसा मेकअप कि पहचान पत्र भी पहचानने से इनकार कर दे।
बरसात गई, ‘बरसात के बाद’ नहीं गया!

सबसे बड़ा सवाल सड़क निर्माण को लेकर दिए गए उस आश्वासन पर है कि “बरसात के बाद सड़क बन जाएगी।”
अब जनता कैलेंडर लेकर पूछ रही है—
“साहब, बरसात तो चली गई, लेकिन सड़क कब आएगी?”
लगता है बरसात और सड़क के बीच कोई पुरानी दुश्मनी है। बरसात खत्म हो गई, बादल चले गए, पानी चला गया, लेकिन ‘बरसात के बाद सड़क बनेगी’ वाला वादा अभी तक वहीं खड़ा है।
पानी छिड़कने की मांग, मास्क बांटने की नौबत
लोगों ने सड़क पर नियमित पानी का छिड़काव कराने की मांग की थी। जब पानी नहीं आया तो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोचा—चलो, जनता को मास्क ही बांट देते हैं।
यानी सड़क की धूल रोकने की जिम्मेदारी व्यवस्था की थी, लेकिन व्यवस्था ने शायद जिम्मेदारी भी धूल में मिला दी। अब जनता अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी खुद उठा रही है।
दुकानदार बोले- ग्राहक आएं या धूल?
सड़क किनारे दुकानदारों की हालत भी कम मजेदार नहीं है। दुकान खोलते हैं तो ग्राहक कम और धूल ज्यादा आती है। दिनभर सामान साफ करो और अगले वाहन के गुजरते ही प्रकृति फिर से दुकान पर ‘धूल का नया कोट’ चढ़ा देती है।
दुकानदारों की हालत देखकर लगता है कि अब बोर्ड लगाना पड़ेगा—
“ग्राहक कृपया मास्क पहनकर आएं, यहां सामान के साथ धूल मुफ्त मिलती है।”

जनता का सवाल सीधा है
लोगों का कहना है कि बरसात में गड्ढों से परेशान हुए, अब धूल से परेशान हैं। सड़क कब बनेगी, यह सवाल अब भी जस का तस है।
फिलहाल अंबिकापुर की जनता के पास दो ही विकल्प दिखाई दे रहे हैं—
या तो सड़क बनने का इंतजार करें, या फिर मास्क, झाड़ू और धूल साफ करने के सामान का स्टॉक बढ़ा लें।
क्योंकि सड़क कब बनेगी, यह तो जिम्मेदार ही बताएंगे…
लेकिन धूल कब तक उड़ती रहेगी, इसका जवाब जनता रोज अपनी सांसों के साथ दे रही है।

