पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया से उभरे एक नए राजनीतिक अभियान ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी सीजेपी ने अपनी अलग पहचान बनाई है। पार्टी की गतिविधियों और अभियानों को देखकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या इसका मकसद चुनावी राजनीति में उतरना है या फिलहाल सरकार और व्यवस्था पर दबाव बनाने वाले समूह के रूप में काम करना है।

सीजेपी का दावा है कि उसने हाल के दो चर्चित मामलों में जनदबाव बनाने में अहम भूमिका निभाई। पहला मामला नीट पेपर लीक से जुड़ा है, जबकि दूसरा नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों के एनरोलमेंट को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया के फैसले का है।

नालसार मामले में बीसीआई के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर विरोध तेज हुआ। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी बीसीआई चेयरमैन मनन मिश्रा की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पोस्ट किया। इसके बाद बीसीआई ने अपना फैसला वापस लिया और मनन मिश्रा की ओर से छात्रों से माफी भी मांगी गई।

इस पूरे घटनाक्रम ने सीजेपी को यह भरोसा दिया कि सोशल मीडिया के जरिए संगठित जनदबाव बनाया जा सकता है। हालांकि, किसी फैसले में किसी संगठन की भूमिका और उसके प्रत्यक्ष प्रभाव को लेकर अलग-अलग दावे हो सकते हैं, इसलिए इसे लेकर स्वतंत्र रूप से तथ्यों की पड़ताल जरूरी है।

अब सीजेपी ने अपना अगला मुद्दा सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को बनाया है। स्वतंत्रता दिवस से ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ की शुरुआत की गई है। संगठन का कहना है कि देश के सरकारी स्कूलों की समस्याओं को जनता के सामने लाया जाएगा और सरकार से सुधार की मांग की जाएगी।

सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका के मुताबिक, अभियान का उद्देश्य लोगों को अपने क्षेत्र के सरकारी स्कूलों की समस्याओं को सामने लाने के लिए प्रेरित करना है। उनका कहना है कि यदि सरकार ने इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया तो संगठन आंदोलन का रास्ता अपनाएगा।

अभियान के तहत सोशल मीडिया पर अलग-अलग इलाकों के सरकारी स्कूलों की तस्वीरें और वीडियो साझा किए जा रहे हैं। इनमें जर्जर भवन, बुनियादी सुविधाओं की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी अपने गांव में स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने के दौरान सरकारी स्कूल की स्थिति पर चिंता जताई। उनका संदेश यही रहा कि आजादी के दशकों बाद भी बच्चों को बेहतर सरकारी स्कूल उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बना हुआ है।

लेकिन सीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल उसकी आगे की राजनीतिक दिशा को लेकर है। क्या वह सिर्फ सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाने वाले जनअभियान चलाएगी या भविष्य में चुनावी राजनीति का हिस्सा बनेगी?

फिलहाल संगठन के बयानों से संकेत मिलता है कि उसका जोर मुद्दा आधारित आंदोलनों पर है। यदि ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ भी पहले अभियानों की तरह सोशल मीडिया और जमीन पर समर्थन जुटाने में सफल रहता है, तो सीजेपी का प्रभाव एक संगठित प्रेशर ग्रुप के रूप में बढ़ सकता है।

हालांकि, किसी भी राजनीतिक संगठन की असली ताकत लंबे समय तक जनता के बीच मौजूदगी, संगठनात्मक ढांचे और लगातार जनसमर्थन से तय होती है। इसलिए आने वाला समय बताएगा कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ केवल सोशल मीडिया आधारित दबाव समूह बनकर रह जाती है या भारतीय राजनीति में एक नई राजनीतिक ताकत के रूप में अपनी जगह बनाने की कोशिश करती है।

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