आरटीआई से सामने आया अतिक्रमण का मामला, सिंचाई विभाग ने जारी किए नोटिस; सरकारी जमीन की निगरानी पर उठे सवाल
अंबिकापुर। सरगुजा जिले में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण का एक बड़ा मामला सामने आया है। अंबिकापुर के बांकी जलाशय से जुड़ी नहर की जमीन पर कथित रूप से बड़े पैमाने पर कब्जा कर पक्के निर्माण किए जाने का मामला उजागर हुआ है। खैरबार से लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) तक नहर की जमीन पर 200 से अधिक लोगों द्वारा अतिक्रमण किए जाने की जानकारी सामने आई है। आरोप है कि नहर के हिस्सों को पाटकर वहां घर, दुकानें और यहां तक कि स्कूल तक बना दिए गए हैं। इस मामले ने सिंचाई विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी संपत्तियों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता आलोक दुबे द्वारा सूचना के अधिकार के माध्यम से जुटाई गई जानकारी के बाद यह मामला सामने आया है। जिस नहर का उद्देश्य किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाना और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना था, उसी की जमीन पर कथित कब्जों ने नहर के अस्तित्व और उसके उपयोग को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
नहर की जमीन पर पक्के निर्माण, सिंचाई व्यवस्था पर सवाल

बांकी जलाशय की नहर क्षेत्र के किसानों के लिए सिंचाई के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। नहर के माध्यम से खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी, लेकिन अब इसके विभिन्न हिस्सों में अतिक्रमण की शिकायत सामने आई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, खैरबार से राष्ट्रीय राजमार्ग तक नहर की जमीन पर 200 से अधिक स्थानों पर कब्जे किए जाने का आरोप है। इन स्थानों पर आवासीय मकान, व्यावसायिक दुकानें और अन्य पक्के निर्माण होने की बात कही जा रही है। कुछ स्थानों पर स्कूल भवन बनाए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
यदि नहर की जमीन पर किए गए निर्माणों से जल प्रवाह बाधित हो रहा है, तो इसका सीधा असर सिंचाई व्यवस्था और किसानों को मिलने वाले पानी पर पड़ सकता है। हालांकि, अतिक्रमण के वास्तविक क्षेत्रफल, प्रभावित नहर की लंबाई और जल प्रवाह पर पड़ने वाले प्रभाव का निर्धारण विभागीय सीमांकन एवं तकनीकी जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।
आरटीआई से सामने आया मामला, विभाग ने जारी किए नोटिस

आरटीआई कार्यकर्ता आलोक दुबे के माध्यम से मामला सामने आने के बाद सिंचाई विभाग की कार्रवाई चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विभाग ने कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी किए हैं और आगे कार्रवाई करने की बात कही है।
हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नोटिस जारी होने के बाद आगे की कार्रवाई किस समय सीमा में पूरी की जाएगी। क्या विभाग जमीन का सीमांकन कर सभी कब्जों की पहचान करेगा? क्या संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद अवैध निर्माण हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी? इन सवालों के जवाब विभाग की आगामी कार्रवाई से ही मिल सकेंगे।
जब कब्जे हो रहे थे, तब कहां था विभाग?
इस मामले ने सरकारी जमीन की सुरक्षा और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि नहर की जमीन पर लंबे समय से निर्माण होते रहे, तो समय रहते इसकी निगरानी क्यों नहीं की गई? क्या विभाग को इन कब्जों की जानकारी नहीं थी, या शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी?
सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की रोकथाम केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए नियमित निरीक्षण, राजस्व अभिलेखों से मिलान, सीमांकन और नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है। साथ ही, यह भी जांच का विषय है कि संबंधित निर्माण कब हुए और उस दौरान जिम्मेदार अधिकारियों की क्या भूमिका रही।
किसानों को मिलेगा नहर का पूरा लाभ या जारी रहेगा इंतजार?
बांकी नहर पर कथित अतिक्रमण का यह मामला केवल सरकारी जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों के सिंचाई अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। यदि नहर का मूल स्वरूप प्रभावित हुआ है, तो उसका असर कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है।
अब निगाहें सिंचाई विभाग और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। जरूरत इस बात की है कि पूरे नहर क्षेत्र का निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए, अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए और जांच में अवैध पाए जाने वाले निर्माणों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या प्रशासन बांकी नहर की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराकर किसानों के लिए सिंचाई व्यवस्था बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा, या मामला नोटिस जारी करने तक ही सीमित रह जाएगा?
