13 किलोमीटर दूर से गाय-बैलों की बारात लेकर पहुंचे ग्रामीण, कलेक्टोरेट परिसर बना अस्थायी ‘गौशाला’

अंबिकापुर। सड़कों पर बैठे मवेशियों से परेशान ग्रामीणों ने ऐसा अनोखा प्रदर्शन किया कि देखने वाले भी सोच में पड़ गए कि आखिर शिकायत करने कौन आया है और शिकायत किसकी है। ग्राम परसा-भकुरा के ग्रामीण सड़क पर घूम रहे गाय-बैलों को हांकते हुए करीब 13 किलोमीटर दूर अंबिकापुर कलेक्टोरेट पहुंच गए। इसके बाद उन्होंने मवेशियों को सीधे कलेक्टोरेट परिसर में प्रवेश करा दिया।

ग्रामीणों का कहना है कि गांव की सड़कों पर आए दिन निराश्रित गाय-बैलों का जमावड़ा लगा रहता है। रात के समय सड़क पर बैठे मवेशी वाहन चालकों को दिखाई नहीं देते और दुर्घटना का कारण बन जाते हैं। कई बार बाइक सवारों से लेकर भारी वाहन चालक तक हादसे का शिकार हो चुके हैं।

शिकायत लेकर नहीं, ‘शिकायतकर्ता’ लेकर पहुंचे

आमतौर पर ग्रामीण अपनी समस्याओं का आवेदन लेकर कलेक्टोरेट पहुंचते हैं, लेकिन इस बार परसा-भकुरा के ग्रामीणों ने शिकायत का अनोखा तरीका चुना। वे कागज-पेन लेकर नहीं, बल्कि सड़क पर घूम रहे गाय-बैलों को ही ‘सबूत’ बनाकर कलेक्टोरेट पहुंच गए।

करीब 13 किलोमीटर का सफर तय कर ग्रामीणों ने मवेशियों को कलेक्टोरेट परिसर में पहुंचा दिया। अचानक परिसर में गाय-बैलों की भीड़ देखकर अधिकारी-कर्मचारी भी हैरान रह गए। मानो कलेक्टोरेट में अचानक कोई सरकारी बैठक नहीं, बल्कि ‘मवेशी सम्मेलन’ आयोजित हो गया हो।

सड़क पर मवेशी, खेत में नुकसान

ग्रामीणों का कहना है कि समस्या सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है। खुले में घूमने वाले यही मवेशी खेतों में पहुंचकर धान, मक्का सहित अन्य फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि शहर में पकड़े जाने वाले कुछ मवेशियों को रात में गांव की ओर छोड़ दिया जाता है, जिसके बाद वे किसानों की फसल चर जाते हैं।

ग्राम पंचायत परसा के पूर्व सरपंच ने बताया कि गांव की सड़कों पर मवेशियों के बैठे रहने से लगातार दुर्घटना का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मवेशियों के लिए उचित व्यवस्था करने की मांग की है।

‘मालिक आराम में, ग्रामीण परेशान’

ग्रामीणों ने उन मवेशी पालकों पर कार्रवाई की मांग की है, जो अपने पशुओं को खुला छोड़ देते हैं। उनका कहना है कि पशु पालने वाले जिम्मेदारी से बच जाते हैं, जबकि सड़क पर बैठे मवेशियों और खेतों में होने वाले नुकसान की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है।

ग्रामीणों का साफ कहना है कि वे मवेशियों को कलेक्टोरेट इसलिए लेकर आए हैं ताकि प्रशासन अब तय करे कि इन्हें कहां रखा जाए और इनके चारे-पानी की क्या व्यवस्था हो।

अब गेंद कलेक्टर के पाले में

ग्रामीणों के इस अनोखे प्रदर्शन ने प्रशासन के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब सिर्फ कागज पर नहीं बल्कि जमीन पर देना होगा। ग्रामीणों ने मानो अपनी शिकायत की ‘लाइव डिलीवरी’ कर दी है।

अब देखना यह है कि कलेक्टोरेट पहुंची गाय-बैलों की इस ‘बारात’ को प्रशासन कहां विदा करता है और सड़कों पर घूमने वाले निराश्रित मवेशियों की समस्या का स्थायी समाधान कब होता है। फिलहाल ग्रामीणों का संदेश साफ है—“शिकायत बहुत कर ली साहब, इस बार समस्या को ही आपके दरवाजे तक ले आए हैं।”

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