सरगुजा बचाओ संघर्ष समिति ने लगाए गंभीर आरोप, CCTV-डीवीआर की फॉरेंसिक जांच और पीड़िता का स्वतंत्र पूरक बयान दर्ज कराने की मांग

अंबिकापुर। शहर के स्कूल रोड स्थित अनुपम वस्त्रालय से जुड़े मामले में सरगुजा बचाओ संघर्ष समिति ने पुलिस की शुरुआती विवेचना पर गंभीर सवाल उठाते हुए पुलिस महानिरीक्षक, सरगुजा रेंज के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की है। समिति ने आरोप लगाया है कि मामले की प्रारंभिक जांच के दौरान पीड़िता के मूल कथन को पूरी तरह दर्ज नहीं किया गया तथा आरोपी की पहचान और घटना की प्रकृति से संबंधित तथ्यों को लेकर भी विसंगतियां हैं। समिति ने पूरे मामले की निष्पक्ष विवेचना कराने, आवश्यक होने पर विवेचक बदलने और सभी उपलब्ध डिजिटल व परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जांच कराने की मांग की है।

समिति की ओर से दिए गए आवेदन के अनुसार, घटना 11 अगस्त 2026 को स्कूल रोड स्थित अनुपम वस्त्रालय में हुई थी। शिकायत के मुताबिक, पीड़िता अपने पति के लिए कपड़े खरीदने दुकान पहुंची थी। पीड़िता ने आरोप लगाया कि दुकान के अंदर कपड़े दिखाने के बहाने उसे अंदर बुलाया गया और वहां उसके साथ जबरदस्ती की गई। विरोध करने पर कथित रूप से धमकी भी दी गई। घटना के बाद पीड़िता ने पुलिस से संपर्क किया।

मामले में सिटी कोतवाली अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 0563/2026 दर्ज किया गया। प्रारंभिक रूप से BNS की धारा 74 और 351(3) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना शुरू की गई।

FIR में मूल शिकायत के तथ्य शामिल नहीं करने का आरोप

सरगुजा बचाओ संघर्ष समिति का आरोप है कि पीड़िता के पति द्वारा लिखे गए मूल हस्तलिखित आवेदन में घटना से संबंधित विस्तृत तथ्य दर्ज थे, लेकिन FIR में कथित तौर पर सभी तथ्यों को यथावत शामिल नहीं किया गया। समिति ने मांग की है कि मूल आवेदन को केस डायरी का हिस्सा बनाया जाए और उसकी तुलना FIR, पुलिस के पूर्व कथन तथा मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कथन से की जाए।

समिति ने यह भी आरोप लगाया है कि पीड़िता की सीमित शैक्षणिक पृष्ठभूमि का कथित रूप से लाभ उठाते हुए उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष सीमित बातें ही बताने के लिए निर्देशित किया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।

आरोपी के नाम को लेकर भी सवाल

शिकायत में आरोपी की पहचान को लेकर भी कथित विसंगति का मुद्दा उठाया गया है। समिति का दावा है कि पीड़िता द्वारा बताए गए व्यक्ति का नाम कौशल केडिया है, जबकि पुलिस रिकॉर्ड में रोशन केडिया नाम दर्ज किया गया। समिति ने मांग की है कि संबंधित व्यक्ति की वास्तविक पहचान, पहचान संबंधी दस्तावेज, दुकान के स्वामित्व और व्यवसाय से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि रिकॉर्ड में नाम किस आधार पर दर्ज किया गया।

तत्कालीन विवेचक की भूमिका पर सवाल

मामले की प्रारंभिक विवेचना करने वाले तत्कालीन विवेचक प्रधान आरक्षक राजेश चतुर्वेदी की भूमिका पर भी समिति ने सवाल उठाए हैं। समिति के अनुसार, पीड़िता की ओर से की गई शिकायतों के बाद विवेचक की कार्यप्रणाली को लेकर विभागीय स्तर पर कार्रवाई हुई और उन्हें निलंबित किया गया।

समिति का कहना है कि ऐसी स्थिति में पूर्व विवेचना के दौरान दर्ज किए गए कथनों और एकत्र किए गए साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जाना आवश्यक है, ताकि किसी भी संभावित त्रुटि या प्रभाव की स्थिति स्पष्ट हो सके।

CCTV और डिजिटल साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच की मांग

समिति ने अनुपम वस्त्रालय में लगे CCTV कैमरों के DVR, NVR, हार्ड डिस्क और अन्य उपलब्ध स्टोरेज मीडिया को सुरक्षित करने तथा उनकी डिजिटल फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की है। इसके अलावा CCTV सिस्टम की रिकॉर्डिंग सेटिंग, कैमरा स्टेटस, तारीख और समय की सेटिंग तथा रिकॉर्डिंग में किसी तरह की रुकावट या बदलाव की भी तकनीकी जांच की मांग की गई है।

साथ ही दुकान के आसपास मौजूद अन्य दुकानों और प्रतिष्ठानों के CCTV फुटेज को भी तलाशकर सुरक्षित करने की मांग की गई है। समिति का कहना है कि इन फुटेज से पीड़िता के दुकान में प्रवेश और बाहर निकलने सहित घटना से जुड़े परिस्थितिजन्य तथ्यों की जांच में मदद मिल सकती है।

पीड़िता का स्वतंत्र पूरक बयान दर्ज कराने की मांग

समिति ने पीड़िता का स्वतंत्र एवं विस्तृत पूरक बयान किसी निष्पक्ष विवेचक के माध्यम से दर्ज कराने की मांग की है। आवेदन में कहा गया है कि पूर्व विवेचक की भूमिका को लेकर आरोप होने के कारण पीड़िता का बयान पूर्व प्रभाव से अलग वातावरण में दर्ज किया जाना चाहिए।

समिति ने यह भी मांग की है कि पीड़िता से उसके प्रारंभिक बयान, मूल शिकायत, FIR में दर्ज तथ्यों और पूर्व न्यायिक कथन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी ली जाए।

धाराओं की भी नए सिरे से समीक्षा की मांग

शिकायत में घटना की प्रकृति के आधार पर लागू कानूनी धाराओं की भी समीक्षा करने की मांग की गई है। समिति का कहना है कि यदि जांच के दौरान पीड़िता द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप साक्ष्यों से पुष्ट होते हैं, तो मामले में लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों का नए सिरे से परीक्षण किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही पीड़िता की अनुसूचित जनजाति की स्थिति, आरोपी की जातीय स्थिति और घटना की परिस्थितियों के आधार पर SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं, इसकी भी स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।

BNSS की धारा 180 और 183 का दिया हवाला

समिति ने अपने आवेदन में BNSS की धारा 180 के तहत पीड़िता का पूरक अथवा अतिरिक्त पुलिस कथन दर्ज कराने की मांग की है। इसके अलावा परिस्थितियां उचित पाए जाने पर BNSS की धारा 183 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष अतिरिक्त न्यायिक कथन दर्ज कराने की विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाने का आग्रह किया गया है।

समिति ने अपने आवेदन में न्यायालयों के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है कि अतिरिक्त कथन की आवश्यकता प्रत्येक मामले में स्वतः नहीं होती, लेकिन यदि पूर्व कथन को प्रभावित किए जाने का विश्वसनीय आधार सामने आता है तो मामले की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है।

निष्पक्ष जांच की मांग

सरगुजा बचाओ संघर्ष समिति ने पुलिस महानिरीक्षक से मांग की है कि मामले में अब तक हुई विवेचना की स्वतंत्र समीक्षा की जाए। मूल शिकायत, FIR, पूर्व पुलिस एवं न्यायिक कथनों का तुलनात्मक परीक्षण करने के साथ CCTV, डिजिटल रिकॉर्ड, गवाहों और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाए।

समिति का कहना है कि मामले में लगाए गए आरोपों की वास्तविकता निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसलिए किसी भी पक्ष के प्रभाव से अलग रहकर विवेचना पूरी कराई जानी चाहिए।

हालांकि, समिति की ओर से लगाए गए आरोपों पर पुलिस और संबंधित अन्य पक्ष का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। आरोपों की पुष्टि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकेगी।

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